Ab duniya ki khabar kon kare

शिकवा-ए-इज़्तिराब कौन करे
अपनी दुनिया ख़राब कौन करे

गिन तो लेते हैं उँगलियों पे गुनाह
रहमतों का हिसाब कौन करे

इश्क़ की तल्ख़-कामियों के निसार
ज़िंदगी कामयाब कौन करे

हम से मय-कश जो तौबा कर बैठें
फिर ये कार-ए-सवाब कौन करे

बहार आई किसी का सामना करने का वक़्त आया…
सँभल ऐ दिल कि इज़हार-ए-वफ़ा करने का वक़्त आया..

कहाँ तक ख़त्म रहता दरमियाँ पर दिल का अफ़्साना…
बिल-आख़िर दरमियाँ से इब्तिदा करने का वक़्त आया…

 

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की

उन को क्या फ़िक्र कि मैं पार लगा या डूबा
बहस करते रहे साहिल पे जो तूफ़ानों की

 

अजीब रंग तेरे हुस्न का लगाव में था…
गुलाब जैसे कड़ी धूप के अलाव में था…

है जिस की याद मेरी फ़र्द-ए-जुर्म की सुर्ख़ी…
उसी का अक्स मेंरे एक एक घाव में था…

 

यहाँ वहाँ से किनारे मुझे बुलाते रहे…
मगर मैं वक़्त का दरिया था और बहाव में था…

मैं पुर-सुकूँ हूँ मगर मेरा दिल ही जानता है…
जो इंतिशार मोहब्बत के रख-रखाव में था…

 

जब तनी सलाख़ों से झाँकती है तन्हाई…
दिल की तरह पहलू से लग के बैठ जाते हो…

तुम मेरे इरादों के डोलते सितारों को…
नाउम्मीदी के ख़लाओं में रास्ता दिखाते हो…

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